बस्तर के दुर्गम अंचलों में डिजिटल क्रांति का नया सवेरा, बदली कोलेंग की सूरत
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बस्तर के दुर्गम अंचलों में डिजिटल क्रांति का नया सवेरा, बदली कोलेंग की सूरत


शहर 08 April 2026
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बस्तर के दुर्गम अंचलों में डिजिटल क्रांति का नया सवेरा, बदली कोलेंग की सूरत

जगदलपुर, 08 अप्रैल। किसी समय छत्तीसगढ़ के बस्तर का नाम सुनते ही जेहन में केवल घने जंगल और माओवाद की दहशत उभरती थी। जिले के दरभा ब्लॉक का कोलेंग गांव भी एक ऐसा ही इलाका था, जहां विकास की किरणें नक्सली साये और दुर्गम रास्तों के कारण पहुंचने से कतराती थीं, लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। कभी गोलियों की गूंज के लिए पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र में अब की-बोर्ड की टिक-टिक और डिजिटल लेनदेन की गूंज सुनाई दे रही है।

इस परिवर्तन की कहानी गांव के ही एक शिक्षित युवा संतोष कुमार के इर्द-गिर्द घूमती है। हायर सेकेंडरी तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद संतोष ने शहर की ओर रुख करने के बजाय अपने ही गांव की मिट्टी को सींचने का फैसला किया। पिछले तीन वर्षों से वे ग्राम पंचायत कॉम्प्लेक्स में एक कॉमन सर्विस सेंटर का संचालन कर रहे हैं। जिस क्षेत्र में कभी नेटवर्क की समस्या और संचार के साधनों का अभाव था, वहां संतोष अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से ग्रामीणों को सुविधाएं सुलभ करवा रहे हैं। आज उनकी वजह से कोलेंग सहित क्षेत्र के चांदामेटा, मुण्डागांव, छिंदगुर, कांदानार, सरगीपाल, काचीरास आदि गांवों के ग्रामीणों को छोटी-छोटी जरूरतों, जैसे नकदी निकासी, बैंक खाता खोलने या आयुष्मान कार्ड बनवाने के लिए दरभा या जगदलपुर तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।

संतोष की सेवाएं केवल बैंकिंग तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे ई-श्रम कार्ड, किसान पंजीयन और पैन कार्ड जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज भी गांव में ही तैयार कर रहे हैं। विशेष रूप से पिछले वर्ष आधार पंजीयन की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने गांव में ही आधार कार्ड बनाने की सुविधा शुरू की है, जो इस दुर्गम क्षेत्र के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। अब यहाँ के निवासियों को जाति, आय और निवास प्रमाण पत्र जैसे जरूरी कागजात बनवाने के लिए मीलों का सफर तय नहीं करना पड़ता, जिससे उनके समय और मेहनत के साथ-साथ पैसों की भी बड़ी बचत हो रही है।

नक्सलवाद के प्रभाव और नेटवर्क की चुनौतियों को मात देते हुए संतोष ने यह साबित कर दिया है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो विकास की धारा को सबसे अंतिम छोर तक पहुंचाया जा सकता है। इस कार्य से जहां वे स्वयं हर महीने लगभग 15 हजार रुपये की आय अर्जित कर आत्मनिर्भर बने हैं, वहीं वे अपने गांव सहित क्षेत्र को भी डिजिटल युग की मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं। संतोष कुमार का यह प्रयास न केवल कोलेंग की डिजिटल दूरियों को पाट रहा है, बल्कि यह उस आत्मविश्वास का भी प्रतीक है जो बस्तर के युवाओं में अब माओवाद की दहशत को पीछे छोड़कर अपने भविष्य को संवारने के लिए जागृत हो रहा है। आज कोलेंग इलाके में डिजिटल लेनदेन की सुगमता, बदलते बस्तर और सशक्त होते ग्रामीण भारत की एक जीवंत तस्वीर पेश करती है।

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